Sunday, 28 August 2011

नवगीत की पाठशाला पर--

नवगीत की पाठशाला पर प्रकाशित संजीव सलिल का नवगीत एक अच्छा नवगीत है। परन्तु इसका प्रारम्भ इन पंक्तियों से होता है-ढो रहा है
संस्कृति की लाश
शहर का एकांत
हाँ पर-" संस्कृति की लाश "का आशय है कि शहर में संस्कृति मर चुकी है तभी तो "संस्कृति की लाश" जैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है ....... पर भाई मेरे संस्कृति कभी मरती नहीं है, बदलती भी बहुत कम है बदलती है तो सभ्यता बदलती है संस्कृति नहीं। फिर मरने की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है। यदि संस्कृति मर जायेगी तो फिर बचेगा ही क्या ? संस्कृति हमारी रग रग में रची बसी है...... चाहे शहर में रहें या गाँव में संस्कृति हमेशा बची रहती है।
अच्छा नवगीत है परन्तु शुरुआत की ये पंक्तियाँ बदलाव चाहती हैं..... नवगीत में असत्य भी नहीं होना चाहिये। डा० सम्पूर्णानन्द का लेख संस्कृति और सभ्यता पढ़ लीजिये फिर आपका सारा भ्रम दूर हो जायेगा।
http://www.navgeetkipathshala.blogspot.com/

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